मोदी की चुप्पी, मोदी के बोल!* *(आलेख : राजेंद्र शर्मा)*



हैरानी की बात नहीं है कि संसद के पांच दिन के लिए प्रस्तावित, किंतु चार दिन ही चले विशेष सत्र के आखिरी दिन, सत्ताधारी पार्टी के सांसद रमेश बिधूड़ी ने मुस्लिमविरोधी सांप्रदायिक गाली-गलौच का जो इतिहास कायम किया, उस पर प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी से, अपने ट्विटर एकाउंट तक से दो शब्द तक नहीं कहलवाए गए हैं। मणिपुर को जलता देखते रहने के बाद भी पूरे अस्सी दिन तक, उस पर दु:ख या पछतावे या चिंता का एक शब्द तक नहीं बोलने वाले प्रधानमंत्री की, अपनी पार्टी के एक सांसद के लोकसभा में खुलेआम नफरती सांप्रदायिक बोल बोलने पर चुप्पी शायद ही किसी को हैरान करेगी। उल्टे सचाई यह है कि प्रधानमंत्री की यह चुप्पी, इस पूरे प्रसंग को सांप्रदायिक कंसोलिडेशन का ही हथियार बनाने की कोशिश में, उक्त संसदीय कदाचार के बाद से ही सत्ता पक्ष के अन्य मुंहों से निकले बोलों को ही, आगे बढ़ाती है।

बेशक, सत्ताधारी पार्टी के भी विशेष रूप से बदजुबान सांसदों में गिने जाने वाले, इस दक्षिण दिल्ली के सांसद ने जिस तरह भरी संसद में अपनी सांप्रदायिक नफरत की उल्टी ही कर दी और उसे संसद टीवी के जरिए तथा उससे बढ़कर सोशल मीडिया में वाइरल हुई वीडियो क्लिपों के जरिए दुनिया भर ने देख लिया, उसके बाद मोदी-शाह की भाजपा ने प्रकटत: नुकसान कम करने की भी कुछ कोशिशें की हैं। इन कोशिशों में अपनी पार्टी के दोषी सांसद को कारण बताओ नोटिस दिया जाना भी शामिल है। यह दूसरी बात है कि सभी जानते हैं कि वर्तमान सत्ताधारी पार्टी में ऐसे कारण बताओ नोटिस, तब तो झूठ-मूठ की रस्मअदायगी से रत्तीभर ज्यादा नहीं होते हैं, जब शिकायत सांप्रदायिकता की अति की हो। वास्तव में यह स्वांग भी इसलिए जरूरी हो गया था कि भाजपा सांसद ने घोर और आक्रामक सांप्रदायिक नफरत की उस सचाई को सारी दुनिया के सामने दिखा दिया, जो बार-बार तथा विभिन्न तरीकों से संघ के ईको-सिस्टम में अपना काम तो लगातार करती आ रही थी, लेकिन तिनके को ओट बनाकर। संसद के मंच पर पहली बार उसका खुलकर प्रदर्शन किया गया है। इसलिए, सत्ताधारी पार्टी के लिए, कारण बताओ नोटिस की तिनके की ओट फिर खड़ी करना जरूरी हो गया।

भारतीय जनतंत्र के दुर्भाग्य से कुछ ऐसी ही तिनके की ओट स्पीकर के पद की ओर से जुटाने की भी कोशिश की गयी। वाइरल वीडियो में सब कुछ साफ-साफ सारी दुनिया के देख लेने के बाद, लोकसभा के स्पीकर की ओर से, आपत्तिजनक शब्दों को कार्रवाई के रिकार्ड से हटा देेने भर की कार्रवाई को, तिनके की ओट लेकर खुद को अलग करने की कोशिश ही कहा जाएगा। इसके अलावा, भाजपा के गालीबाज सांसद को स्पीकर ने इसकी चेतावनी भर देकर जाने दिया कि 'दोबारा ऐसा नहीं हो'! इस मामले में स्पीकर के निष्पक्षता का दिखावा तक छोड़ देने का अंदाजा सिर्फ इस एक तथ्य से लगाया जा सकता है कि इससे पहले के मानसून सत्र के आखिर में, लोकसभा में कांग्रेस ग्रुप के नेता अधीर रंजन चौधुरी को, जो वास्तव में व्यावहारिक मानों में सदन में नेता विपक्ष हैं, सत्ताधारी पार्टी के मंत्री/मंत्रियों के लिए ''धृतराष्ट्र'' की पौराणिक संज्ञा का प्रयोग करने के लिए ही, सदन से निलंबित कर दिया गया था। जाहिर है कि सत्ता पक्ष के सदस्यों के लिए लोकसभा अध्यक्ष का एक पैमाना है और विपक्षी सदस्यों के लिए एक अलग ही पैमाना है।

बहरहाल, तिनके की ओट में छुपने की इस मजबूरी का दायरा भी बस इतना ही था। इस पूरे प्रसंग में, संबंधित भाजपा सांसद के अलावा उस समय सदन में उसके ठीक पीछे बैठे दो पूर्व-मंत्रियों, हर्षवर्द्घन और रविशंकर प्रसाद की भी भूमिका तीखी आलोचना के दायरे में आ गयी। दोनों माननीय पूर्व-मंत्री, पूरे प्रकरण के दौरान हंस-हंसकर, अपने अनुमोदन से, अपने सांप्रदायिक गालीबाज संगी को बढ़ावा ही दे रहे थे, जो वीडिया में दर्ज भी हुआ था। इस मामले में काफी आलोचनाएं आने के बाद, रविशंकर प्रसाद ने तो एक संक्षिप्त आम खंडनात्मक बयान जारी कर, यह दावा कर के अपना दामन साफ हो गया मान लिया कि वह तो हमेशा मर्यादाओं का पालन करने में विश्वास रखते हैं, आदि। लेकिन, दिल्ली के सांसद हर्षवर्द्घन ने सोशल मीडिया में एक लंबी सफाई लिखकर अपना बचाव किया, जिसमें अपने मुस्लिम विरोधी नहीं होने का दावा किया गया था। इससे भी बेढ़ब यह कि उन्होंने यह बहाना बनाने की भी कोशिश की कि कहा-सुनी के बीच वह ठीक-ठीक सुन ही नहीं पाए थे कि उनके बगल में खड़ा उनका संगी सांसद क्या-क्या कह रहा था? लेकिन, इससे भी भयानक यह कि गंभीरता के इस सारे पाखंड के बीच, पूर्व-मंत्री ने अपने बयान में इसे बसपा सदस्य दानिश अली और भाजपा सदस्य रमेश बिधूड़ी के बीच बहस और उत्तर-प्रत्युत्तर का मामला बनाकर, मामूली बना देने की बेशर्म कोशिश की थी।

यही सूत्र है, जिसे बाद में आगे बढ़ाते हुए, भाजपा के एक और बदजुबानी के लिए कुख्यात सांसद, निशिकांत दुबे ने, यह कहने की रस्म अदायगी करने के बाद कि जो बिधूड़ी द्वारा कहा गया उचित नहीं था, स्पीकर को लिखी चिट्ठी में उल्टे बसपा सदस्य दानिश अली पर ही इसका इल्जाम लगा दिया कि वही, रमेश बिधूड़ी के भाषण के बीच में बार-बार टोक कर और प्रधानमंत्री के खिलाफ आपत्तिजनक बातें कहकर, उन्हें भड़का रहे थे। और जैसा कि संघ-भाजपा के झूठ के प्रचार का एक जाना-पहचाना हथियार ही हो गया है, उन्होंने पीड़ित सांसद पर बाकायदा षडयंत्र का आरोप लगा दिया कि उन्होंने षडयंत्रपूर्वक भाजपा सांसद को गुस्सा दिलाया और वह ''बेचारे'' इस षडयंत्र के जाल में फंसकर, आपत्तिजनक बोल बोल बैठे! दुबे ने अपने इस पत्र के माध्यम से स्पीकर से सदन की अनुशासन समिति से पूरे मामले की जांच कराने की मांग की है। कहने की जरूरत नहीं है कि पीड़ित पर ही आरोप लगाने का यह पूरा खेल, संघ-भाजपा के अनुमोदन से ही खेला जा रहा है। इसमें अगर किसी को संदेह हो, तो सोशल मीडिया में संघ की ट्रोल सेना द्वारा इस संबंध में जो कुछ कहा गया है और जिस तरह इस हास्यास्पद ''षडयंत्र सिद्घांत'' को प्रचारित किया गया है, उससे यह साफ हो जाता है कि हर्षवर्द्घन तथा निशिकांत दुबे के रास्ते, पूरा संघ परिवार सांप्रदायिक गालीबाज भाजपा सांसद के पीछे खड़ा है। हैरानी की बात नहीं है कि यह सिलसिला जल्द ही, पीड़ित सांसद को तरह-तरह की धमकियां दिए जाने तक पहुंच चुका है।

याद रहे कि यहां पहुंचकर यह सब, रमेश बिधूड़ी की शर्मनाक करतूत और सांप्रदायिक नफरती बोली से, संघ-भाजपा के बचाव से आगे बढ़कर, इस प्रकरण को ही सांप्रदायिक नफरत फैलाने का औजार बनाने तक पहुंच जाता है। यह वह जगह है, जहां रमेश बिधूड़ी की सांप्रदायिक गालियां, ''गोली मारो सालों को...'' के मोदी सरकार के मंत्रियों के नारों और ''वोटिंग मशीन का बटन दबाकर...शाहीन बाग में झटका लगाने'' के देश के गृहमंत्री के नुस्खों की बगल में खड़ी नजर आती हैं। और ठीक यहीं उनकी ही बगल में प्रधानमंत्री की चुप्पी को खड़े देखा जा सकता है, इस सब का अनुमोदन करते हुए और अपने अभयदान से सब को बढ़ावा देते हुए!

दिलचस्प बात यह है कि प्रधानमंत्री मोदी की चुप्पी और उनके बोल, दोनों एक ही काम करते हैं, सांप्रदायिक ध्रुवीकरण की धार को सान पर चढ़ाने का काम। यह संयोग ही नहीं है कि जो प्रधानमंत्री, रमेश बिधूड़ी के कारनामे पर एकदम चुप्पी साधे रहे हैं, वही प्रधानमंत्री पिछले दिनों में अपनी आत्मप्रशंसा के अलावा, एक ही मुद्दे पर विशेष रूप से मुखर रहे हैं — कथित सनातन धर्म पर उदयनिधि स्टालिन की टिप्पणी। यहां इस विषय पर विस्तार से चर्चा करने की गुंजाइश तो नहीं है, पर इतना तो याद दिलाया ही जा सकता है कि जिस समय जी-20 के सिलसिले में विदेशी मेहमानों का भारत आना शुरू हो रहा था, उस समय भी प्रधानमंत्री मोदी को इसी सिलसिले में बुलायी गयी मंत्रिमंडल की विशेष बैठक में भी, अपने मंत्रिमंडलीय सहयोगियों को इसके लिए तिकतिकाना बखूबी याद रहा था कि सनातन के मुद्दे पर ''उपयुक्त जवाब'' देना चाहिए!

उसके बाद, चुनाव की ओर बढ़ रहे राज्यों, मध्य प्रदेश तथा छत्तीसगढ़ में और राजस्थान में भी, पहली ही फुर्सत में मोदी ने खुद ''उपयुक्त जवाब'' देने की कमान संभाल ली और इस प्रकरण के रास्ते विपक्षी इंडिया गठबंधन को हिंदू-विरोधी, धर्मविरोधी, भारतीय संस्कृति विरोधी और अंतत: भारत विरोधी भी घोषित कर दिया। यह इसके बावजूद था कि यह मानना संभव ही नहीं है कि मोदी इससे कतई बेखबर हो सकते हैं कि उन्नीसवीं सदी के आखिर में गुजरात से ही, हिंदी-गुजराती प्रदेश के, तथाकथित सनातन धर्म के सबसे उग्र खंडनकर्ता, स्वामी दयानंद निकले थे, जिन्होंने खुद को सनातनी कहने वाले धार्मिक-सामाजिक सुधार-विरोधी मनुवादियों के खिलाफ ही, हिंदी-पंजाबभाषी क्षेत्र में अपनी पाखंड-खंडिनी पताका गाड़ी थी और एक के बाद एक शास्त्रार्थों के जरिए खुद को सनातनी कहने वालों को चुनौती दी थी। हैरानी की बात नहीं है मोदी की इस मुखरता में, कथित सनातनियों के मनुवाद के खिलाफ, खुद हिंदू धार्मिक तथा सामाजिक सुधारकों के उन्नीसवीं व बीसवीं सदी के वास्तविक और विराट संघर्षों पर चुप्पी भी शामिल है।

याद रहे कि इससे कुछ ही पहले, कर्नाटक चुनाव की हार के फौरन बाद, मोदी की ऐसी ही मुखरता समान नागरिक संहिता पर भी सुनाई दी थी। उससे पहले कश्मीर के विनाश से लेकर, नागरिकता कानून, विदेशी घुसपैठिए आदि, यहां तक कि कब्रिस्तान-श्मशान तक, ऐसे हरेक मुद्दे पर, जिसका सांप्रदायिक ध्रुवीकरण के लिए इस्तेमाल किया जा सकता था, मोदी की बोली सुनाई दी थी और सांप्रदायिक ध्रुवीकरण के खिलाफ जाने वाले हर मुद्दे पर, मोदी की वैसी ही मुखर चुप्पी।

*(लेखक वरिष्ठ पत्रकार और साप्ताहिक पत्रिका 'लोक लहर' के संपादक हैं।)*